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Abstract

भारतीय संस्कृति देश की सीमा से बाहर प्रायः बौद्ध धर्म के साथ गयी। बौद्ध संस्कृति यह शब्द कुछ भिन्न मालूम होता है। क्योंकि संस्कृति देश जाति से सम्बन्धित है, धर्म के साथ रिश्ता जोड़ना यह संस्कृति से भिन्न जरुर दिखाई देता है। लेकिन बौद्ध संस्कृति भारत के साथ विश्व को जोड़ने का काम करती है। संस्कृति या संस्कारो का प्रवाह, प्रवाह की भांति देश और काल के अनुसार आदान-प्रदान होते रहता है। बौद्ध संस्कृति भारत की जिस संस्कृति का अभिन्न अंग है, उसका एक दीर्घ काल व्यापी जीवन है- दीर्घ काल ही नहीं, दीर्घ देश व्यापी भी कहना चाहिए। किसी समय आर्यों और द्रविड़ो से भी भिन्न मानव जातियां भारत में वैसे ही निवास करती थी, जैसे दूसरें देशो में। बौद्ध संस्कृति भारत के साथ विश्व में देश काल से प्रभावित हो बराबर गतिमान होती गयी। इस काम में बौद्ध संस्कृति ने बड़ी दीर्घ दर्शिता से काम लिया। उसने कभी भी स्थिरता और पूर्णता का दावा नहीं किया। बौद्ध लोगो ने दुसरों को देने के नाम पर कभी अपनी संस्कृति को थोपने का काम नहीं किया, बल्कि समय के अनुसार बदलने का काम भी किया। इसलिए विश्व में बौद्ध संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है कि बिना रक्तपात, बिना बल प्रयोग के सभ्य जगत के अधिकांश भाग पर उसका सम्मान और स्वागत हुआ।
बौद्ध संस्कृति ने हर देश में जाकर वहां के परिस्थिति को समझकर उदार दृष्टिकोण रखकर राष्ट्रीयता का पालन किया। इसलिए विश्व में अन्य जो धर्म है, वे अपने ही विचार को सही मानने पर तुले रहते है और अपने ही धार्मिक विचार और संस्कृति को महत्वपूर्ण मानकर उन देशों की संस्कृति की अवहेलना कर देते है। लेकिन बौद्ध संस्कृति में इस तरह का कोई आग्रह दिखाई नहीं देता। बौद्ध समाज का हमेशा यहीं मानना रहा है कि बौद्ध धर्म के संस्थापक और विचारकों ने कभी भी अपने ही शिक्षा को महत्त्व देकर दूसरों को कभी कम नहीं माना है। और आज भी यहीं विचार रखकर बौद्ध जितना अपने संस्कृति या शिक्षा को महत्व देते है। उसी तरह बौद्ध समाज अन्य धर्म या संस्कृति को भी अपने जैसा ही महत्त्व देते है। इसलिए बौद्ध संस्कृति विश्व में उदार के रूप में दिखाई देती है। इसलिए बौद्ध देशों में विदेशी और स्वदेशी संस्कृतियों का संघर्ष नहीं हुआ और न ही धर्म के नाम पर एक ही जाति के टुकड़े हुये।

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