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Abstract

    आज का वर्त्तमान जीवन जितना सुविधाओ ंसे परिपूर्ण है उतना ही बेचैनी, दुख और संताप से ंभरा हुआ है। पश्चिमी देशों नें मनुष्य के विकास का जो मार्ग दिया है, उसमें मनुष्य के मन को समझकर केवल बाहरी पहलू को समझा है। आंकड़े बताते है कि आज अमेरिका सबसे विकसित देश है, जो विज्ञान की प्राप्ति में विश्व के सर्वोच्च स्थान पर है, लेकिन इस देश के नागरिक सबसे ज्यादा विक्षिप्त है। जिन्हें सोने के लिए नींद की गोलियाँ लेनी पड़ती है। वर्त्तमान जीवन में दुःख, बेचैनी एवं अवसाद के मूल कारण कर्मयोग का रहस्य को समझने मे ंहै।  यदि मनुष्य शब्द की गहराईयाँ को समझे तो मनुष्य का अर्थ है- मन वाला। इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा मन इंसान के पास है। अर्थात मन को समझते हुए विज्ञान के साथ विकास, दोनो का संतुलन बनाते हुए मनुष्य ऐसी विकास यात्रा पर पहूँच सकता है। जहाँ जीवन विषाद और भय से मुक्त परम आनन्द की सीमा को छू सकता है। यही वास्तविक विकास है।

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