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Abstract

स्त्री सशक्तिकरण से अभिप्राय है कि स्त्री को भी पुरूष के समान विकास करने के बराबर अवसर देना, उन्हें भी मनचाही शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार देना और घर-परिवार तथा जीवन के हर क्षेत्र में स्वतन्त्र निर्णय लेने की स्वेच्छा प्रदान करना। आज जब हम घर, समाज या देश की एकता तथा विकास की बात करते हैं, प्रत्येक जन स्त्री हो या पुरूष सभी का सकारात्मक योगदान आवश्यक है। विकास के पथ पर गति प्रदान करने में सामाजिक,  आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, तकनीकी तथा राजनैतिक घटकों का विशेष महत्व है, जिन का मूलतः स्त्रियों में अभाव है। स्त्रियों की खराब आर्थिक स्थिति की महादेवी वर्मा ने बड़ी स्टीक विवेचना की है। समाज ने स्त्री के संबंध में अर्थ का ऐसा विषम विभाजन किया है कि साधारण श्रमजीवी वर्ग से लेकर सम्पन्न वर्ग की स्त्रियों तक की स्थिति दयनीय ही लगने योग्य है। वे केवल उत्तराधिकार से ही वंचित नहीं है वरन अर्थ के संबंध में सभी क्षेत्रों में एक प्रकार की विवशता के बंधन में बंधी हुई है। कही पुरूष ने न्याय का सहारा लेकर और कही स्वामित्व की शक्ति से लाभ उठाकर उसे इतना परालंबी बना दिया है कि उस की सहायता के बिना संसार पथ में एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकती।‘1 महिलाओं की दयनीय आर्थिक स्थिति पर 1988 में जो आंकड़े प्रस्तुत किये गये है वास्तव में भयावह है ‘ॅवउमद कव जूव जीपतके वि ंसस जीम ूवतसकश्े ूवताण् प्द म्गबींदहम जीमल तमबमपअम 10ः वि ंसस पदबवउम ंदक वूद ं उमतम 1ः वि ंसस ूवतसकश्े उमंद वि चतवकनबजपवदण्ष्2 2014 तक महिलाओं की आर्थिक स्थिति में अवश्य कुछ सुधार हुए हैं परन्तु शहरी क्षेत्र की महिलाओं की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की स्थिति अब भी विषम है। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं का विकास भी उत्तरोत्तर हो आज हम सब के लिए एक चुनौती है।

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