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European Journal of Business &

Social Sciences

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ISSN: 2235-767X

Volume 07 Issue 02

February 2019

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संत कबीर दास जी तथा गुरु नानक देव जी के ववचार ंव विक्षाओं का तुलनात्मक

अध्ययन

रेखा ,

अवसस्टेंट प्र फे सर,

डी एच लारेन्स कॉलेज ऑफ़ एजुके िन फॉर वुमेन,झज्जर ।

Email Id –naveenkumarberwal@gmail.com

संत कबीर दास जी तथा गुरु नानक देव जी मध्य काल के ववख्यात संत, दार्शवनक, समाज सुधारक थे

। दोनों नेही समाज मेंप्रचवलत अंधववश्वास, पाखंडवाद, मूवतशपूजा तथा वहंदू- मुस्लिम एकता का पाठ

पढाया। उन्ोंनेसमाज मेंव्याप्त बुराइयों को दू र करनेका प्रयास वकया ।

संत कबीर दास

जन्म तथा विक्षा-

वहंदी सावहत्य जगत के वनगुशण भस्लि की ज्ञानाश्रयी र्ाखा के प्रमुख कववयों मेंसेएक संत

कबीरदास नेभारतीय जनमानस को सबसेअवधक प्रभाववत वकया | यद्यवप उनके ववषय मेंबहुत सी

खोजों हुई हैबावजूद इसके संत कबीरदास का जीवन – वृत्त अभी भी संवदग्ध है| इस बारेमेंजो साक्ष

प्राप्त हैउनमेंसबसेबड़ी वकवदंवतयां कबीर के जन्म वतवथ मेंप्रचवलत है|

‘कबीर चररत्र – बोध’ के मतानुसार संवत्1455 ववक्रमी, ज्येष्ठ सुदी पूवणशमा के वदन सोमवार को कबीर

का जन्म कार्ी के लहरतारा तालाब के वनकट हुआ था | इनके पंवथयों के मतानुसार भी कबीर का जन्म

1455 संवत्पूणशमासी को ही ठहरता है|

“चौदह सौ पचपन साल गए, चंद्रवार एक ठाठ गए |

ज्येष्ठ मुदी बरसायत को, पूरणमासी प्रगट भये||

धन गरजैदावमनी दमके, बूंदेंवरसेझर लाग गए |

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लहर तारा तालाब मेंकमल स्लखले, तहं कबीर भानुप्रगत भये||”

जबवक इस मत को डॉ श्याम सुन्दर दासजी वववादास्पद मानतेहैउनका कथन हैवक कबीर का जन्म

1455 संवत्मेंज्येष्ठ पूवणशमा चन्द्रवार को नही ंपड़ता | पद को ध्यान सेपढनेसेसंवत्1456 वनकलता

हैक्योवक उसमेंस्पष्ट र्ब्ों मेंवलखा हैवक चौदह सौ पचपन साल गए अथाशत 1455 संवत्बीत गया

था | वकन्तुडॉ रामकु मार वमाशवलखतेहैवक गणना सेसंवत्1456 मेंचन्द्रवार को ही ज्येष्ठ पूवणशमा

पड़ती है| अत: इस दोहेके अनुसार कबीर का जन्म संवत्1456 की ज्येष्ठ पूवणशमा को हुआ | वकन्तु

गणना करनेपर ज्ञात होता हैवक चन्द्रवार को ज्येष्ठ पूवणशमा नही ंपड़ती | चन्द्रवार के बदलेमंगलवार

वदन आता है| इस प्रकार बाबूश्यामसुंदर दास जी का कथन प्रमावणत नही ंमाना जा सकता |

‘कवव कसौटी’ मेंभगत कबीर का जन्म संवत्1455 और मृत्यु1575 माना गया है| परन्तुआधुवनक

खोजों के आधार पर इनका जन्म काल ज्येष्ठ सुदी पूवणशमा सोमवार ववक्रमीय संवत्1456 और मृत्यु

1575 माना गया है|

इनके जन्म स्थान लहरतारा तालाब के बारेमेंभी अभी बहुत मतभेद है| परन्तुअवधकतर ववद्द्वान

इनका जन्म कार्ी का लहरतारा तालाब के वनकट ही मानतेहै| ऐसा कहा जाता हैवक स्वामी रामानन्द

नेअपनेएक भस्लि की ववधवा पुत्री को पुत्रवती होनेका आर्ीवाशद देवदया | फलस्वरूप उस ववधवा

ब्राह्मण पुत्री को एक पुत्र उत्पन्न हुआ वकन्तुलोक – लाजवर् उसनेअपनेपुत्र को लहरतारा तालाब के

वकनारेफें क वदया |

वहााँपर नीरू नामक जुलाहेर्ुद्ध होनेके वलए आया और उस बालक को अपनेघर लेआया |

वन:संतान होनेके कारण उसका लालन पालन बड़ेप्यार सेवकया और अपना व्यवसाय वसखाया |

कबीर के वर्क्षा के सम्बन्ध मेंप्रचवलत हैवक वेअनपढ थेलेवकन साधुओं के साथ बैठकर बहुश्रुत हो गए

थेऔर साधु– संगत तथा स्वानुभव सेही उन्ोंनेज्ञान अवजशत वकया | परन्तुडॉ माताप्रसाद गुप्त, आचायश

परर्ुराम चतुवेदी एवं डॉ ओमप्रकार् र्माशर्ास्त्री नेउन्ेंपढा – वलखा महान व्यस्लि माना है| इनका

मत हैवक “मवस कागद छू यो नही ं, कलम गह्यो नही ंहाथ |” की उस्लि उनके ववरोवधयों नेप्रचाररत की

हुई हैजबवक कबीरदास वनरक्षर नही ंथे| इन्ोनेवकसी ववद्यालय मेंवर्क्षा नही ंपाई थी | परन्तुवेपढे

वलखेथे|

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रामानन्द कबीरदास के गुरु थेवजनसेकबीर नेवनगुशण भस्लि की दीक्षा ली | वजसके सम्बन्ध मेंउन्ोंने

वलखा भी है–

“कार्ी मेंहम प्रगत भयेहै, रामानन्द वचताय |”

कबीर पर वहन्दुओं और मुसलमानों, दोनों धमों के संस्कारों का काफी गहरा प्रभाव पड़ा और रामानन्द

एवं उनके ववचारों नेभी प्रभाववत वकया | कबीरदास मूलतः मस्त और फक्कड़ व्यस्लि थे| वेवनभीक

प्रकृ वत के थे| वेएक गृहस्थ थे, पर साथ ही साथ वेसंत भी थे| इन्ी ंगुणों के कारण उनके पदों में

जीवन का यथाथशहै, एवं उनके अन्तस्की कोमल भावनाओं का वचत्रण दोहोंमेंहुआ है|

कबीर समाज सुधारक के रूप में

कबीर मूलत: भि थे, संत थे, भस्लि साधना मेंवेसहज और सत्याचरण के वहमायती थे| अत:

समाज सुधार के मागशमेंआनेवाली ववकृ वतयों के ववरुद्ध उन्ोंनेवबना लाग लपेट के अपना स्वर व्यि

वकया जो आज भी जरुरी है|

कबीर जन्म सेववद्रोही थेऔर उन्ोंनेधमश– साधना के ही सामवजक संरचना में, मानवीय आचरण में

समस्त आडम्बरों, वनरथशक कमशकाण्ों का ववरोध वकया | कबीर के रूप मेंहमेंएक ऐसा प्रकार् –

स्तम्भ वमला है, जो मानव समाज की एकता, परस्पर प्रेम और सहज सामावजक जीवन, वजसमेंधमश, वणश

और जावत का कोई भेद न हो – ऐसेसमाज की संरचना मेंऔर सबसेऊपर व्यस्लि को मानवीय गुणों

सेसम्पृि करनेमेंसवदयों सेप्रकार् देता रहा हैऔर भववष्य मेंभी देता रहेगा |

एक भि कवव के रूप मेंएक प्रगवतर्ील समाज (जो धमशके साथ कमशसंयुि भी हो) की संरचना में

कबीर की वचंता और दर्शन उन्ेंअन्य भि कववयों सेअलग पहचान देता है|

कबीर के समाज दिशन की प्रासंवगकता

कबीर नेभारत मेंऐसेसमय मेंजन्म वलया जब भारतीय समाज वनरार्ा मेंडू ब रहा था | दू सरेर्ब्ों में

कहेंतो सामावजक रूप सेकबीर के समय मेंवणश, वगशऔर धमश– सम्प्रदाय मेंपरस्पर ऊाँ च – नीच की

दीवारेगहरी हो रही थी | धमशवणशऔर सम्प्रदायगत श्रेष्ठता का भाव चरम सीमा पर था | अत: धावमशक

आडम्बर कमशकाण् जावतवाद आवद प्रधान होता गया | ऐसेसमय मेंववश्रृंखवलत होतेऔर परस्पर