Page 1 of 8

European Journal of Business &

Social Sciences

Available at https://ejbss.org/

ISSN: 2235-767X

Volume 07 Issue 02

February 2019

Available online: https://ejbss.org/ P a g e | 46

ब्रिब्रिश आब्रथिक नीब्रिय ोंका भारिीय अथिव्यवस्था पर प्रभाव

म ब्रनका,

प्राध्याब्रपका] अथिशास्त्र ]

रा+- व- मा- ब्रव- मब्रिकपुर, नई ब्रिल्ली । E.mail- guliamonika1984@gmail.com

भारत मेंप्रारंभभक आक्रमणकाररय ं और भिभिश साम्राज्यवाभिय ं मेंमुख्य अंतर यह था भक

अंग्रेज ं के अभतररक्त भकसी अन्य प्रारंभभक आक्रमणकारी नेन ही भारतीय अथथव्यवस्था की संरचना में

पररवतथन भकया और न ही धन की भनरंतर भनकासी का भसद्ांत अपनाया। भारत मेंभिभिश शासन के

फलस्वरूप भारतीय अथथव्यवस्था]उपभनवेशी अथथव्यवस्था में रूपांतररत ह गयी तथा भारतीय

अथथव्यवस्था की सभी नीभतयां एवं कायथक्रम उपभनवेशी भहत ं के अनुरूप बननेलगे।

भारिीय अथिव्यवस्था पर ब्रिब्रिश शासन के ब्रवस्तृि प्रभाव ोंकी ब्रववेचना (&

अनौद्य गीकरण &भारिीय हस्तब्रशल्प का ह्रास &

1818 के चािथर एक्ट द्वारा भिभिश नागररक ं क भारत से व्यापार करने की छू ि भमलने के

फलस्वरूप भारतीय बाजार सस्तेएवं मशीन भनभमथत आयात सेभर गया। िू सरी ओर भारतीय उत्पाि ं के

भलयेयूर पीय बाजार ं मेंप्रवेश करना अत्यंत कभिन ह गया। 1820 के पश्चात त यूर पीय बाजार

भारतीय उत्पाि ं के भलयेलगभग बंि ही ह गये। भारत मेंरेलवेके भवकास नेयूर पीय उत्पाि ं क भारत

के िू र-िराज के क्षेत् ं तक पहंचनेमेंमहत्वपूणथभूभमका भनभायी।

भारत मेंपरंपरागत हस्तभशल्प उद्य ग का ह्रास इसभलये नहीं हआ भक यहां औद्य गीकरण या

औद्य भगक क्रांभत हयी। बल्कि यह ह्रास अंग्रेजी माल के भारतीय बाजार ं मेंभर जानेसेहआ क् ंभक

भारतीय हस्तभशल्प] अंग्रेज ं के सस्तेमाल का मुकाबला नहीं कर सका। लेभकन इस अवभध मेंयूर प के

अन्य िेश ं के परंपरागत हस्तभशल्प उद्य ग मेंभी भगरावि आयी] पर इसका कारण वहां कारखान ं का

भवकभसत ह ना था। यह वह समय था जहां एक ओर भारतीय हस्तभशल्प उद्य ग तेजी सेपतन की ओर

अग्रसर था तथा वह अपनी मृत्युके कगार पर पहंच गया था] वहीं िू सरी ओर इस काल मेंइंग्लैण्ड में

औद्य भगक क्रांभत तेजी सेअपनेपैर जमा रही थी तथा िेश का तेजी सेऔद्य भगकीकरण ह रहा था। इस

समय भारतीय भशल्पकार एवं िस्तकार पयाथप्त संरक्षण के अभाव मेंभवषम पररल्कस्थभतय ं के िौर सेगुजर

रहेथे] वहींनयेपाश्चात्य अनुप्रय ग ं तथा तकनीक नेउनके संकि क और गंभीर बना भिया।

अनौद्य गीकरण का एक और नकारात्मक प्रभाव था]भारत के अनेक शहर ं का पतन तथा भारतीय

भशल्कल्पय ं का गाव ं की ओर पलायन। अंग्रेज ं की श षणकारी तथा भेिभावमूलक नीभतय ं के कारण बहत

सेभारतीय िस्तकार ं नेअपनेपरंपरागत व्यवसाय क त्याग भिया तथा वेगांव ं मेंजाकर खेती करने

Page 2 of 8

European Journal of Business &

Social Sciences

Available at https://ejbss.org/

ISSN: 2235-767X

Volume 07 Issue 02

February 2019

Available online: https://ejbss.org/ P a g e | 47

लगे।उिाहरणाथथ- बंगाल मेंकं पनी शासन के िौरान िस्तकार ं एवं भशल्पकार ं क बहत कम िर ं पर

काम करनेतथा अपनेउत्पाि अत्यंत कम मूल् ं पर बेचनेहेतुभववश भकया गया। इससेभूभम पर िबाव

बढा। अंग्रेज सरकार की कृ भष भवर धी नीभतय ं के कारण यह क्षेत् पहलेसेही संकिग्रस्त था और भूभम

पर िबाव बढनेके कारण ग्रामीण अथथव्यवस्था भबिु ल चरमरा गयी।

भारत एक सम्पूणथभनयाथतक िेश सेसम्पूणथआयातक िेश बन गया।

कृ षक ोंकी बढ़िी हुयी िररद्रिा

भिभिश सरकार की रुभच के वल लगान मेंवृल्कद् करनेतथा उसका अभधकाभधक भहस्सा प्राप्त करने

मेंथी। इसी लालच की वजह सेअंग्रेज ं नेिेश के कई भहस्स ं मेंभूभम की स्थायी बंि बस्त व्यवस्था लागू

कर िी। इस व्यवस्था मेंसरकार की मांग त ल्कस्थर थी भकं तुलगान ज जमीिार] भकसान सेलेता था वह

पररवतथशील था। अतएव कालांतर मेंलगान की िर ं मेंअत्यभधक वृल्कद् कर िी गयी। लगान अिा न करने

पर भकसान ं क उनकी भूभम सेबेिखल कर भिया जाता था। इससेभकसान भूभम पर अपनेपुश्तैनी

अभधकार ं सेहाथ ध बैितेथे। सरकार द्वारा जमीन की उवथरता बढानेके भलयेअत्यंत कम धन खचथ

भकया जाता था। जमींिार भजन्हेंभकसान ं क भूभम सेबेिखल करनेका अभधकार था] अपनेअभधकार ं

का िुरुपय ग करतेथेतथा लगान मेंअपनेभहस्सेक बढानेके भलयेभकसान ं क बेगार 1⁄4बलपूवथक

कायथ1⁄2 करनेहेतुभववश करतेथे। कृ भष मेंअभधक धन लगानेहेतुसरकार की ओर सेकृ षक ं क भकसी

तरह का प्र त्साहन भी नहीं भिया जाता था। कृ षक ं पर लगान का ब झ अभधक ह जानेपर वेसूिख र ं

सेऋण लेनेपर बाध्य ह जातेथे। सूिख र ज अभधकांशतया गांव के अनाज व्यापारी ह तेथे] काफी

ऊं ची िर ं पर भकसान ं क ऋण िेतेथेतथा ऋण चुकानेहेतुउन्हेंअपनेउत्पाि 1⁄4अनाज1⁄2 क भनम्न

िर ं पर बेचनेहेतुमजबूर करतेथे। इन शल्कक्तशाली सूिख र ं के प्रशासन एवं न्यायालय सेअच्छे संबंध

ह तेथे]भजसका उपय ग वेअपनेभवरुद् ह नेवालेमुकद्दम ं के भलयेकरतेथे।

इस प्रकार भकसान ं के ऊपर सरकार] जमींिार एवं सूिख र ं का भतहरा ब झ ह ता था। अकाल एवं

अन्य प्राकृ भतक आपिाओं के समय कृ षक ं की समस्यायेंऔर भी बढ जाती थीं। अतः भिभिश शासन की

नीभतय ं सेभारतीय कृ भष पर अत्यंत नकारात्मक प्रभाव पडा तथा कृ षक ं की िररद्रता अत्यंत बढ गयी।

पुरानेजमीिार ोंकी िबाही िथा नयी जमीोंिारी व्यवस्था का उिय

वषथ1815 के अंत तक बंगाल की कु ल भूभम का लगभग 50 प्रभतशत िू सरेहाथ ं मेंस्थानांतररत

भकया जा चुका था। इन नयेहाथ ं मेंभूभम के जानेसेजमीिार ं के एक नयेवगथका उिय हआ तथा नये

भू&संबंध ं का भवकास हआ। जमीिार ं के इस नयेवगथके पास सीभमत शल्कक्तयां एवं अत्यल्प संसाधन थे

तथा भूभम पर कब्जेके कारण यह वगथअल्कस्तत्व मेंआया था। लगान व्यवस्था मेंभबचौभलय ं के बढनेसे

प्रत्यक्ष जमींिारी का ल प ह गया तथा भकसान ं पर ब झ और ज्यािा बढ गया। भूभम की मांग बढनेसे

इसकी कीमत ं मेंवृल्कद् हयी तथा भकसान ं की क्रय शल्कक्त सेयह और िू र ह नेलगी। जमीिार ं एवं

भकसान ं के मध्य क ई परंपरागत समझौता न ह नेसेइन जमीिार ं नेकृ भष के भवकास के भलयेन भकसी

Page 3 of 8

European Journal of Business &

Social Sciences

Available at https://ejbss.org/

ISSN: 2235-767X

Volume 07 Issue 02

February 2019

Available online: https://ejbss.org/ P a g e | 48

प्रकार का भनवेश भकया न ही इस कायथमेंक ई रुभच ली। इन जमींिार ं का भहत भिभिश शासन के चलते

रहनेमेंही था और इसीभलयेइन्ह ंनेराष्ट्रीय आंि लन मेंअंग्रेज ं का साथ भिया।

कृ ब्रष मेंस्स्थरिा एवों उसकी बबाििी

कृ षक ं के पास न ही कृ भष के साधन थेऔर न ही कृ भष मेंभनवेश करनेके भलयेधन। जमींिार ं

का गांव ं सेक ई संबंध नहीं था तथा सरकार द्वारा कृ भष तकनीक एवं कृ भष सेसंबंभधत भशक्षा पर व्यय

भकया जानेवाला धन अत्यल्प था। इन सभी कारण ं सेभारतीय कृ भष का धीरे-धीरेपतन ह नेलगा तथा

उसकी उत्पािकता बहत कम ह गयी।

भारिीय कृ ब्रष का वाब्रणज्यीकरण

उन्नीसवी शताब्दी के उत्तराधथ मेंभारतीय कृ भष मेंएक और महत्वपूणथ पररवतथन हआ] वह था

कृ भष का वाभणज्यीकरण। इस समय तक कृ भष जीवनयापन का एक मागथथी न भक व्यापाररक प्रयत्न। अब

कृ भष पर वाभणल्कज्यक प्रभाव आनेलगा। अब कु छ भवशेष फसल ं का उत्पािन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय

बाजार के भलयेह नेलगा न भक ग्रामीण उपय ग के भलए। मूंगफली] गन्ना] पिसन] कपास]भतलहन]

तम्बाकू]मसाल ं] फल ं तथा सल्कब्जय ं जैसी वाभणल्कज्यक फसल ं का उत्पािन बढ गया क् ंभक येफसलें

अब अन्न के स्थान पर अभधक लाभिायक भसद् ह नेलगीं थीं। संभवतः बागान उद्य ग ं चाय ]काफी]

रबर एवं नील इत्याभि मेंत कृ भष का वाभणज्यीकरण अपनेचरम त्कषथमेंपहंच गया। इन बागान उद्य ग ं

का स्वाभमत्व-लगभग यूर भपय ं के हाथ ं मेंथा तथा इनके उत्पाि मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय बाजार मेंबेचनेके

उद्देश्य सेही तैयार भकयेजातेथे।

वाभणज्यीकरण और भवशेषीकरण की इस प्रभक्रया क कई कारण ं नेप्र त्साभहत भकया। जैसेमुद्रा

अथथव्यवस्था का प्रसार] रूभढ और परंपरा के स्थान पर संभविा और प्रभतय भगता] एकीकृ त राष्ट्रीय बाजार

का अभ्युिय] िेशी एवं भविेशी व्यापार मेंवृल्कद्] रेलवे एवं सडक संचार साधन ं से राष्ट्रीय मंिी का

भवकास एवं अंग्रेजी पूंजी के आगमन सेभविेशी व्यापार मेंवृल्कद् इत्याभि।

भारतीय कृ षक ं के भलयेकृ भष का वाभणज्यीकरण एक भववशता थी। भूभम कर अत्याभधक ह नेसे

उसेअिा कर पानेमेंवह असमथथथा। फलतः उसेसाहूकार ं सेऋण लेना पडता था] भजनकी ब्याज िरें

काफी अभधक ह ती थीं। इस ब्याज की चुकानेके भलयेउसेअपनेउत्पाि क काफी कम मूल् पर

बेचना पडता था। कई बार त उसेअपनेही अनाज क साहूकार के यहां बेचकर िुबारा जरूरत पडने

पर िुगनेमूल् पर उसेखरीिना पड जाता था। कृ भष का वाभणज्यीकरण ह नेसेभारतीय कृ भष मूल् ं पर

भविेशी उतार-चढाव का प्रभाव भी पडनेलगा। उिाहरणाथथ 1860 के पश्चात कपास के मूल् ं मेंज

वृल्कद् हयी उससेभबचौभलय ं क काफी लाभ प्राप्त हआ] जबभक कृ षक ं क इसका क ई लाभ नहीं

भमला। इसी प्रकार 1866 मेंजब मंिी आयी त इसकी मार भकसान ं पर पडी] भजसके फलस्वरूप गाव ं

मेंभकसान ऋण के ब झ मेंऔर िब गये] उनकी जमीनेंनीलाम ह गयीं] उन्हेंअकाल का सामना करना

पडा तथा िभक्षण भारत मेंव्यापक पैमानेपर भकसान आंि लन हये। इस प्रकार कृ भष के वाभणज्यीकरण

सेन त कृ षक ं क क ई लाभ हआ और न ही कृ भष उत्पािन मेंक ई वृल्कद् हयी।