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Abstract

स्त्री का संसार प्राचीन समय से ही एक वाद-विवाद के विशय से जूझता रहा है जहां समकालीन युग में स्त्री की यौनिकता को एक कुंठित दृश्टिकोण से देखा जाता है जिसे बलात्कार, षोशण, अपमान, वस्त्रो के लबादे से उनकी पहचान को बनाना इत्यादि द्वारा उनकी ’यौनिकता’ जिसे प्रष्न के कटघरे में खड़ा करता रहा है क्योंकि समाज के द्वारा इसी यौनिकता को प्रष्न किया जाना लगा है। आधुनिकता ने यौनिकता को गलत व्याखित किया है।

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