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Abstract

भारतीय संविधान का मूल्यांकन करने पर हम एक विशेष तथ्य से अवगत होते हैं। यह एक राजनीतिक प्रलेख के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करने पर विशेष बल देता है। भारतीय संविधान में ऐसे प्रावधान देखने को मिलते हैं जो सामाजिक क्रान्ति को प्रोत्साहित करते हैं अथवा उनके लिए आवश्यक परिस्थितियों का निर्माण करते हैं भारतीय संविधान की प्रस्तावना से स्पष्ट हो जाता है कि संविधान एक ऐसे लोकतंत्र की कल्पना करता है जिसमें नागरिकों के लिये सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति; विश्वास, निष्ठा और धर्म की स्वतंत्रता तथा प्रतिष्ठा एवं अवसर की समानता उपलब्ध हो।सुरू से ही हमारे संविधान में सामाजिक न्याय का लक्ष्य स्वीकार कर लिया गया था।भारतीय संविधान में अनेक ऐसे प्रावधान किये गए है , जिससे आधुनिक चेतना के अनुरूप अपेक्षित सामाजिक परिवर्तन को बल मिल सके और एक न्यायपूर्ण समाज की रचना हो सके। सामाजिक न्याय का अभिप्राय समाज मे रहने वाले सभी व्यक्तियोंएवंजातियो ंकी समानता से है। सामाजिक न्याय का उद्देश्य है सामाजिक असमानताओ व कुरीतियो को दूर करना।यह समाज के वंचित व सुविधा विहीन वर्गों की दशा सुधारने पर बल देता है ताकि उन्हें सम्मानपूर्ण  जीवन  जीने का अवसर मिल सके। आर्थिक न्याय से अभिप्राय है कि उत्पादन व वितरण के साधनों का समुचित वितरण हो तथा धन का केन्द्रीकरण कुछ ही हाथों में न हो। मौलिक अधिकारों द्वारा सामाजिक न्याय की दिशा मे परिवर्तन लाने के लिए कई व्यवस्थाएं की गईं हैं। नीति-निदेशक सिद्धान्तों के अन्तर्गत उन नीतियों और सिद्धान्तों को शामिल किया गया है जिसके सहारे भारत में लोक कल्याणकारी राज्य व एक समतामूलक समाज की स्थापना की जा सकती है।लेकिनसंविधान के भागो में सामाजिक-आर्थिक न्याय का उपबन्ध कर देने मात्र से ही व्यवस्था मे ं परिवर्तन नहीं आ सकता।

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