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Abstract
बीसवीं सदी के अन्तिम तीन दशकों में हिन्दी कथा साहित्य एक नयी स्त्री चेतना का उदय हुआ और साहित्य में स्त्री की पारंपरिक छवि को बदलने का आन्दोलन भी ज़ोर पकड़ने लगा। इस कालावधि में अनेक लेखिकाओं ने स्त्री विमर्श को वाणी देने का महत्तर काम निभाया है। वैश्विक और भारतीय परिप्रेक्ष्य में नारीवाद के पनरूत्थान में महिला लेखिकाओं की वैचारिक भूमिका का अध्ययन युग की मांग है।