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Abstract
साहित्य के क्षेत्र में राजनीति का प्रभाव मुख्यतः दो रूपों में होता है। “किसी विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा का अनुयायी रचनाकार जब अपने साहित्य द्वारा उस राजनीतिक विचारधारा का प्रसार प्रारम्भ करता है तो उस वर्ग की रचनाएँ साहित्येतर शुद्ध प्रचारवादी बनकर रह जाती हैं। इसका प्रभाव रचनाकार के अस्तित्व को मिटाकर उसे मात्र पुस्तक बनाकर छोड़ता है। किन्तु दूसरे वर्ग में उस श्रेणी का साहित्य आता है, जिसमें रचनाकार युग की मांगो के समसामयिक राजनीतिक के प्रभां को आत्मसात कर उसे अपने साहित्य में अभिव्यक्त कराता है।