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Abstract

कबीर के विचार व भाव जितने तत्कालीन समय में प्रासंगिक थे, उतने ही आज के समय में भी उचित जान पड़ते हैं।  कबीर आज और भी अधिक प्रासंगिक है और कबीर कल सदा-सदा के लिए प्रासंगिक हो उठेगा, इसमें कोई शक नहीं। कबीर की मुक्त चेतना उस सार्थक जीवन स्थितयों का संकेत कर रही हैं जहां आज का विमूढ़ व्यक्ति अपनी ऐतिहासिक और मानवीय भूमिका की खोज कर सके। वही व्यक्ति प्रासंगिक है, जो इस दुनिया को मानव को फिर लौटा सके। प्रस्तुत शोध पत्र में कबीर काव्य में साम्प्रदायिकता की समस्या पर प्रकाश डाला गया है।

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