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Abstract
संत दादू का समाज प्रमुखतः साधारण, अनपढ़, अज्ञानी, पीडित लोगों का समाज था, जिसमें गावों के साधारण किसान, गृहस्थ, मजदूर और कारीगर आदि सम्मिलत थे। उनकी वाणी का परिवेश गांवों के लोगों के दौनंदिन वातावरण का है। दादू लोक रंग में रगे हुए थे इसका अनुमान करना भी कठिन है। ग्रामीण लोगों का जो मानसिक धरातल है, उनकी ज्ञान की सीमा है, उनके ज्ञान की जो उपकरण सामग्री है उसके परिचय और समझ को जो क्षितिज है उसी की सीमा के भीतर उन्हीं की बोलचाल की भाषा शैली में दादू ने अपनी वाणी को मुखरित किया है।