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Abstract

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहकर ही उसके व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास होता है, मनुष्य स्वयं समाज से प्रभावित है और समाज को प्रभावित भी करता है। वह अपने आसपास के वातावरण से प्रभावित हुए बिना स्वतन्त्र रूप से विकसित नहीं हो सकता है। वह जिस लोक में विचरण करता है वहाँ के सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक वातावरण का अवश्य प्रभाव पड़ता है। रीतिकालीन काव्यधारा समाज से विमुक्त मानी जाती है। इस काल के अत्यधिक रचनाकारों ने राजाश्रयों में रहकर शृंगारिक रचनाएँ या फिर अपने आश्रयदाताओं की प्रशंसा के ही गीत गाए हैं। कभी-कभी ये अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए काव्य रचना करते थे। इस संबंध में डॉ. संतराम संघर्षी का मत है, कि ‘‘इस काल की समस्त रचनाएँ शृंगारिकता के गुण से परिपूर्ण हैं। इनका संबंध राजदरबारों से रहा है। ये अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए नायिका भेद, नख-शिख, अलंकार योजना आदि को अपने काव्य का विषय बनाते थे।

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